गढ़वाली लोकसंस्कृति की अमर स्वर यात्रा – चंद्र सिंह राही

गढ़वाली लोकसंस्कृति की अमर स्वर यात्रा – चंद्र सिंह राही

देहरादून : गढ़वाली लोकसंगीत को आत्मा और पहचान देने वाले वरिष्ठ लोकगायक, गीतकार एवं सांस्कृतिक कर्मी चंद्र सिंह राही का जीवन पहाड़ की पीड़ा, संघर्ष और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज रहा है। 28 मई 1942 को गिवाली गांव में जन्मे राही जी ने अपनी संपूर्ण रचनात्मक यात्रा के माध्यम से गढ़वाली लोकसंस्कृति को समृद्ध किया। 10 जनवरी 2016 को उनके अवसान के साथ उत्तराखंड की सांस्कृतिक दुनिया का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।

लोकजीवन से उपजा लोकगायन

पर्वतीय परिवेश में पले-बढ़े चंद्र सिंह राही का बचपन खेत-खलिहानों, जंगलों, मेलों और लोकपरंपराओं के बीच बीता। यही लोकजीवन उनके गीतों की आत्मा बना। उनकी गायकी में बनावट नहीं, बल्कि पहाड़ की सहज सच्चाई और संवेदनशीलता झलकती रही।

गीतों में पहाड़ का दर्द और स्वाभिमान

राही जी के लोकगीतों में पलायन की पीड़ा, उजड़ते गांव, श्रमजीवी पहाड़ी समाज का संघर्ष, प्रेम और प्रकृति का गहरा भाव स्पष्ट दिखाई देता है। उनकी आवाज़ में जहां पीड़ा की करुणा थी, वहीं पहाड़ के स्वाभिमान और चेतना का दृढ़ स्वर भी था। उन्होंने पारंपरिक गढ़वाली लोकधुनों को सहेजते हुए समकालीन सामाजिक सरोकारों को संगीतबद्ध किया।

सांस्कृतिक योगदान

अपने लंबे सांस्कृतिक जीवन में चंद्र सिंह राही ने मंचीय प्रस्तुतियों, लोक उत्सवों और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से गढ़वाली लोकसंगीत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। वे केवल लोकगायक ही नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति के सजग प्रहरी भी थे। नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना उनके जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा।

अवसान, पर अमर विरासत

10 जनवरी 2016 को उनका पार्थिव अवसान हुआ, लेकिन चंद्र सिंह राही की आवाज़, उनके गीत और उनका सांस्कृतिक अवदान आज भी हिमालय की घाटियों, गांवों और प्रवासी उत्तराखंडियों के मन में जीवित हैं। गढ़वाली लोकसंगीत की यह स्वर-यात्रा भले ही थम गई हो, पर चंद्र सिंह राही का नाम और उनकी विरासत उत्तराखंड की सांस्कृतिक स्मृति में सदैव अमर रहेगी।

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