टिहरी के युवा सुभाष रावत ने मत्स्यपालन से लिखी सफलता की कहानी; मछली पालन से दिया रिवर्स माइग्रेशन को जवाब, धामी सरकार की स्वरोजगार योजनाओं से मिली प्रेरणा

टिहरी के युवा सुभाष रावत ने मत्स्यपालन से लिखी सफलता की कहानी; मछली पालन से दिया रिवर्स माइग्रेशन को जवाब, धामी सरकार की स्वरोजगार योजनाओं से मिली प्रेरणा

टिहरी : उत्तराखंड सरकार द्वारा संचालित स्वरोजगार योजनाओं के सकारात्मक परिणाम अब पहाड़ के गांवों में दिखने लगे हैं। टिहरी जनपद के फकोट ब्लॉक स्थित स्यालसू गांव के युवा सुभाष रावत ने मत्स्यपालन को अपनी आजीविका का सशक्त माध्यम बनाकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम की है। कोविड-19 महामारी के दौरान नौकरी गंवाने के बाद, उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ‘आत्मनिर्भर उत्तराखंड’ की सोच को साकार करते हुए गांव में ही नई शुरुआत की।

सरकारी योजनाओं का सहारा, मत्स्यपालन में सफलता की बुनी कहानी

अपने गांव लौटकर, सुभाष ने मत्स्य विभाग की योजनाओं के बारे में जानकारी ली। उन्होंने तालाब निर्माण के लिए आवेदन किया और विभाग की मदद से लगभग 20×10×1.5 मीटर आकार का एक तालाब तैयार करवाया। सरकार की ओर से मत्स्य बीज के रूप में फिंगरलिंग व क्रासफिश भी उपलब्ध कराई गईं। सरकारी अनुदान और विभाग द्वारा प्रदान किए गए प्रशिक्षण ने सुभाष के आत्मविश्वास को और बढ़ाया। उन्होंने पूरी लगन और मेहनत से मत्स्य पालन की शुरुआत की और धीरे-धीरे अपने उत्पादन में वृद्धि की।

आत्मनिर्भरता का नया अध्याय: मॉडर्न फिश आउटलेट और रोजगार के अवसर

अपनी आय में वृद्धि के साथ, सुभाष यहीं नहीं रुके। उन्होंने एक ‘मॉडर्न फिश आउटलेट’ की शुरुआत की, जहाँ वे सीधे अपने उत्पाद बेचते हैं। इस पहल से तीन स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिले हैं। इतना ही नहीं, उनके सफल मॉडल को देखकर आसपास के ग्रामीण भी मत्स्यपालन को अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।

होटल मैनेजमेंट से मत्स्यपालन तक का सफर

होटल मैनेजमेंट में डिप्लोमा करने के बाद सुभाष रावत निजी क्षेत्र में काम कर रहे थे, लेकिन कोविड-19 के कारण उन्हें मुश्किल दौर का सामना करना पड़ा। नौकरी छूटने के बाद, कई अन्य पलायन करने वाले युवाओं की तरह, उन्होंने भी हार मानने की बजाय अपने गांव लौटने और स्वरोजगार स्थापित करने का निश्चय किया। नौकरी जाने के बाद एक कठिन दौर का सामना करते हुए, सुभाष ने हार मानने की बजाय अपने गांव लौटने और स्वरोजगार अपनाने का साहसिक निर्णय लिया।

सुभाष ने मत्स्य विभाग की योजनाओं के बारे में जानकारी ली और तालाब निर्माण के लिए आवेदन किया। विभाग की सहायता और अनुदान से लगभग 20x10x1.5 मीटर आकार का एक आधुनिक तालाब बनाया गया। उन्हें मत्स्य बीज के रूप में फिंगरलिंग (मछली के बच्चे) व क्रासफिश भी उपलब्ध कराई गईं। सरकार से मिले प्रशिक्षण और समय पर अनुदान की मदद से सुभाष ने पूरी लगन के साथ मत्स्य पालन का काम शुरू किया।

आय में हुई लगातार वृद्धि

सुभाष की मेहनत और सरकारी सहयोग के कारण उनका उत्पादन लगातार बढ़ता गया। वित्तीय वर्ष 2020-21 में, सुभाष ने 5.80 क्विंटल मछलियों का उत्पादन कर ₹0.66 लाख की अच्छी आय अर्जित की। अगले वित्तीय वर्ष, 2021-22 में, उन्होंने अपने उत्पादन को बढ़ाते हुए 6.87 क्विंटल मछलियों का उत्पादन किया और लगभग ₹0.96 लाख की आय प्राप्त की। यह लगातार वृद्धि सुभाष की मेहनत और सही दिशा में किए गए प्रयासों का प्रमाण है।

  • वित्तीय वर्ष 2020–21: उन्होंने 5.80 क्विंटल मछलियों का उत्पादन किया और ₹0.66 लाख की आय प्राप्त की।
  • वित्तीय वर्ष 2021–22: यह उत्पादन बढ़कर 6.87 क्विंटल हो गया, जिससे उन्होंने लगभग ₹0.96 लाख की आय अर्जित की।

अपनी आय में लगातार वृद्धि दर्ज करने के बाद, सुभाष ने अब अपने व्यवसाय को विस्तार दिया है। उन्होंने गांव में ही एक मॉडर्न फिश आउटलेट शुरू किया है, जहाँ से वे सीधे उपभोक्ताओं को अपने उत्पाद बेचते हैं।

स्थानीय युवाओं को मिला रोजगार

सुभाष रावत का यह उद्यम अब केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं रहा है। इस मॉडर्न फिश आउटलेट के संचालन से तीन स्थानीय युवाओं को स्थायी रोजगार मिला है। साथ ही, उनकी सफलता को देखते हुए आसपास के कई ग्रामीण भी अब मत्स्यपालन के व्यवसाय से जुड़ने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।

प्रेरणा का स्रोत : आत्मनिर्भर उत्तराखंड का साकार रूप

सुभाष रावत की कहानी इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यदि नीयत साफ हो और सही मार्गदर्शन मिले, तो पहाड़ का युवा भी अपने गांव में रहकर आत्मनिर्भर बन सकता है। वे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ‘आत्मनिर्भर उत्तराखंड’ की परिकल्पना को साकार करने वाले एक आदर्श युवा किसान बन गए हैं। सुभाष की यह यात्रा उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो आज भी अच्छी नौकरी की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। यह कहानी साबित करती है कि स्वरोजगार में भी विकास और समृद्धि की अपार संभावनाएं हैं, खासकर उत्तराखंड जैसे प्राकृतिक रूप से समृद्ध प्रदेश में।

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